फलित ज्योतिष को छद्म विज्ञान क्यों कहा जाता है इसके लिए पहले छद्म विज्ञान की परिभाषा को समझते है।  मूलतः ग्रीक भाषा के शब्द pseudo का अर्थ होता है मिथ्या या भ्रामक अतः pseudoscience का अर्थ हुआ मिथ्या विज्ञान या भ्रामक विज्ञान। छद्म विज्ञान अर्थात pseudoscience शब्द ऐसे विषय के लिए प्रयुक्त किया जाता है जिसे वैज्ञानिक विषय कहा जाता है और उसके सिद्धांतो को वैज्ञानिक सिद्धान्त की तरह पेश किया जाता है परंतु वास्तव वह विषय न तो विज्ञान होता है न ही उसके सिद्धांत वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सही होते है लेकिन व्यक्ति की अज्ञानता तथा विषय के बारे में मिथ्यापूर्ण व भ्रामक प्रचार के कारण ऐसे विषय को विज्ञान मान लिया जाता है फलित ज्योतिष भी एक ऐसा ही विषय है।
आधुनिक युग में व्यक्ति कितना ही अन्धविश्वासी क्यों न हो लेकिन वह स्वयं को अंधविश्वासी कहलाना पसंद नहीं करता ठीक वैसे ही अवैज्ञानिक कहलाना भी पसंद नहीं करता है। जब विज्ञान द्बारा उसके किसी अंधाविश्वास से परिपूर्ण बात को सिरे से नकार देता है तो वह अपनी बात में वैज्ञानिकता को सिद्ध करने के लिए भ्रामक छद्मविज्ञान का सहारा लेता है। चूँकि छद्म वैज्ञानिक तथ्य वैज्ञानिक शब्दावाली में (से लिए जाते है) होते हैं, इसलिए वह अत्यंत भ्रामक होते हैं जिसके कारण सामान्य विज्ञान से अंजान किसी व्यक्ति के लिए वास्तविक विज्ञान और छद्म विज्ञान के मध्य अंतर कर पाना मुश्किल हो जाता है। छद्म विज्ञान को विज्ञान दर्शाने के लिए वैज्ञानिक शब्दावली का प्रयोग किए जाने से सामान्य जन छद्म विज्ञान को भी वैज्ञानिक विषय समझ लेते है लेकिन छद्म विज्ञान की पहचान के कुछ लक्षण या संकेत निम्नलिखित है।
1.पहला संकेत तो यही है कि विज्ञान में निरंतर प्रयोग व अनुसंधान वैज्ञानिक विधि के अनुसार होते रहते हैं जबकि छद्म विज्ञान में ऐसे प्रयोगों एवं अनुसंधानों का अभाव होता है इसलिए छद्म विज्ञान में केवल उन्हीं परिणामों को चुना जाता है जो छद्म विज्ञान के पक्ष में होते हैं और विपरीत परिणामों की उपेक्षा की जाती है।
- चूंकि फलित ज्योतिष विज्ञान नहीं है इसलिए इस विषय में भी यही किया जाता है संयोगवश कोई सिद्धांत किसी व्यक्ति की कुंडली, जीवन से मेल रखता हो तो उसे बढ़ा चढ़ाकर इस प्रकार से प्रस्तुत किया है जिससे कि ज्योतिष विज्ञान ही है, यह विश्वास दिलवाया जा सके।
2.छद्म विज्ञान में वैसे तो शोधकार्य का अभाव होता है लेकिन छद्म विज्ञान को विज्ञान के समकक्ष स्थापित करने के लिए समय समय पर आवश्यकता के अनुरूप छद्म शोधकार्य किए जाते है जिसके निष्कर्ष को किसी मानक पत्रिका में प्रकाशित करवाने की बजाय अन्य निम्न स्तर के जनसंचार माध्यम से प्रकाशित किए जाते है। उनका उद्देश्य पाठकों को ललचाने तक ही सीमित होता है इसलिए उनके शोधपत्रों के शीर्षक सनसनीखेज होते है इसमें मसालेदार और आकर्षक कहानी बनाने के लिए पूर्ववर्ती शोध परिणाम आदि के गलत अर्थ निरुपित किये जाते है और अनुसंधान के साक्ष्य, नमूने, प्रमाण, प्रयोगों के निष्कर्ष आदि अस्पष्ट भाषा में दिए जाते है तथा छद्म विज्ञान में शोधपत्र के अंत में संदर्भ सूची भी नहीं होती है यदि होती भी है तो वह "दैवीय विज्ञान" से उदृत होती है।
- फलित ज्योतिष में जो भी शोध कार्य किए जाते है वह केवल ग्राहकों को फसाने के उद्देश्य को ध्यान में रखकर किए जाते है वैज्ञानिक विधि के अभाव में उन शोध कार्यो का कोई महत्व नहीं होता है।
3.छद्म विज्ञान के सिद्धांत असाधारण होते है जो अनुमान, पौराणिक एवं धार्मिक संदर्भों पर आधारित होते हैं जिन्हें छद्म वैज्ञानिक लाखों लोगों के समक्ष गजब के आत्मविश्वास और निर्भीकता से प्रस्तुत करते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होता है कि उनका दावा बिल्कुल सही है। असाधारण दावों को प्रामाणित करने के लिए असाधारण प्रमाणों की आवश्यकता होती है जिसके लिए वह पौराणिक एवं धार्मिक संदर्भो पर आश्रित रहते है जिससे की उनके असाधारण दावों की सत्यता व प्रमाणिकता पर प्रश्नचिन्ह न लगाया जा सके। इसके अतिरिक्त भी अनेक तथ्य है जिनसे किसी भी छद्मवैज्ञानिक विषय की पहचान कर यह पता लगाया जा सकता है कि विषय विज्ञान है या छद्मविज्ञान।
फलित ज्योतिष भी विज्ञान नहीं बल्कि छद्म विज्ञान है फलित ज्योतिष जिन नवग्रहों पर आधारित है उन नवग्रहों में सूर्य, चंद्र तथा छाया ग्रह कहलाने वाले राहु और केतु भी सम्मिलित है आधुनिक खगोल विज्ञान की बदौलत आज हम जानते हैं कि सूर्य एक तारा है, चंद्र एक उपग्रह है तथा राहु-केतु का अस्तित्व ही नहीं है फिर सूर्य, चंद्र और राहु-केतु को ग्रहों की श्रेणी से निकाला क्यों नहीं गया? ब्रह्मांड के बारे के आधुनिक ज्ञान के पश्चात भी ज्योतिष में ग्रह ही क्यों बने हुए है? यदि फलित ज्योतिष विज्ञान है, तो फिर उसमें आधुनिक ज्ञान का समावेश क्यों नहीं किया गया जबकि विज्ञान में तो नए ज्ञान के लिए दरवाजे हमेशा खुले होते है। विज्ञान के विपरीत फलित ज्योतिष ने कभी भी पुराने व गलत ज्ञान को निकाल कर उसके स्थान पर नवीन व तर्कसंगत ज्ञान के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की जहमत नहीं उठाई। फलित ज्योतिष का आधार ग्रह है जिनका की कुंडली में महत्त्वपूर्ण स्थान है परंतु ग्रहों के साथ चंद्रमा सूर्य जैसे उपग्रह और तारे के साथ राहु केतु जैसे दो कटान बिंदु मात्र को ग्रहों की श्रेणी में ही रखने के परिणामस्वरूप फलित ज्योतिष की आधारभूत अवधारणा ही एक अवैज्ञानिक अवधारणा सिद्ध हो जाती है अतः फलित ज्योतिष को विज्ञान नहीं कहा जाना चाहिए क्योंकि फलित ज्योतिष की बुनियाद ही 100 प्रतिशत गलत है जिस ब्रह्माण्ड के आधार पर फलित ज्योतिष के सिद्धांतों की रचना की गई है उसका सही ज्ञान आदि काल में उपलब्ध न होने से सभी सिद्धांत बोगस है। तत्कालीन ज्ञान के अनुसार ब्रह्माण्ड बेलनाकार था जिसमे सभी ग्रह एक के ऊपर एक इस क्रम में स्थित थे। सबसे नीचे थी हमारी पृथ्वी जिसे स्थिर व चपटी माना जाता था पृथ्वी के ठीक ऊपर सूर्य स्थित था, सूर्य के ऊपर चन्द्रमा, चंद्रमा के ऊपर सभी नक्षत्रों के तारे, तारों के ऊपर बुध, बुध के ऊपर शुक्र, शुक्र के ऊपर मंगल, उसके ऊपर वृहस्पति, और वृहस्पति के ऊपर शनि स्थित था। ब्रह्मांड की इस प्रकार की जानकारी पर बनाए गए फलित ज्योतिष के सिद्धांतो को सही कैसे कहा जा सकता है जाहिर है कि जिस विषय का रचना का आधार ही गलत हो वह विषय सहीं नहीं हो सकता है। क्रमशः

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